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Munger Gun Factory History | मुंगेर बन्दुक फैक्ट्री का इतिहास

 Munger Gun Factory History | मुंगेर बन्दुक फैक्ट्री का इतिहास...

Munger Gun Factory History

वर्ष 1925 में स्थापित मंगेर की बंदूक इंडस्ट्री आज अंतिम सांसें गिन रहीं हैं। स्थापना काल में 36 इकाइयों से शुरू हुई यह इंडस्ट्री में अब महज चार इकाइयों तक सिमटकर रह गयीं हैं। मुंगेर की बंदूक कारीगरी, फिट और फिनिश के लिये देश भर में जानी जाती थी। इतना ही नहीं भारत में बिकने वाली बंदूकों की 50 फीसदी से ज्यादा बंदूकें अकेले मुंगेर की इंडस्ट्री ही सप्लाई करती थी। सरकार ने यदि इस इंडस्ट्री को पुनर्जीवित नहीं किया तो यह इतिहास बन जायेगा।

हुनरमंद कारीगर ग्लॉक पिस्टल, इंसास और एके-47 तक बना सकते हैं: 

मुंगेर के हुनरमंद कारीगर ग्लॉक पिस्टल, इंसास और एके-47 जैसे हथियारों का निर्माण कर सकते हैं। ऐसा कहना है यहां के शस्त्र निर्माताओं का। उनके मुताबिक अब डबल बैरल गन का बाजार लगभग खत्म हो चुका है। हालांकि पहले इसे स्टेटस सिंबल के रूप में देखा जाता था। यहां की फैक्ट्री में काम करने वाली इकाइयों को यदि लाइसेंस और सुविधा मिले तो वे किसी भी हथियार का निर्माण कर सकते हैं। और ये हथियार विदेशों या इंडियन ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में बनने वाले हथियारों से किसी भी मायने में कम नहीं होंगे। लेकिन इसके लिये फैक्ट्री में कंप्यूटर नियंत्रित आधुनिक उपकरण स्थापित करने की जरूरत होगी।

सर्वप्रथम मीर कासिम ने अफगानी आर्मोरर को लाया था मुंगेर: 

पहली बार मीर कासिम ने अफगानी कारीगरों से यहां बंदूक का निर्माण शुरू कराया था। लगभग 20 से 25 अफगानी आर्मोरर को उन्होंने अपने साथ मुंगेर लाया और इस काम के लिये लगाया। इन कारीगरों ने मुंगेर के लोगों को भी यह हुनर सिखाया जो कालांतार में काफी विकसित हुआ। इसके बाद मुंगेर के कई घराने इस काम से जुड़ते चले गये। वे अपने घरों में ही हथियारों का निर्माण करने लगे। वर्ष 1925 से अंग्रेज भी अपनी जरूरत के मुताबिक से इन कारीगरों से हथियार का निर्माण कराने लगे।

1952 में सभी इकाइयों को जेल में किया गया शिफ्ट: 

आजादी के बाद 1952 में देश में आर्म्स एक्ट कानून लाया गया। इसके बाद हथियार निर्माण करने से जुड़े सभी घरानों को सरकार ने एक छत के नीचे काम करने का आदेश दिया। सभी इकाइयों को जेल में हथियार निर्माण के लिये जगह दी गयी। लगभग 20 वर्षों तक हथियारों का निर्माण जेल के अंदर ही होता रहा। 1972 में बिहार औद्योगिक विभाग ने इसे लघु उद्योग का दर्जा दिया। निर्माण में लगी सभी 36 इकाइयों को योगाश्रम के समीप लगभग 10 एकड़ की जमीन में स्थापित किया।

भारतीय क्रांतिकारियों के भी हथियार बनाते थे मुंगेर के कारीगर: 

स्वतंत्रता संग्राम के लिये लड़ने वाले क्रांतिवीरों के लिये मुंगेर के कारीगर हथियार बनाकर उन्हें सप्लाई करते थे। वर्ष 1925 में मेवालाल एंड कंपनी के प्रोराइटर सीताराम शर्मा ने चंद्रशेखर आजाद के लिये रिवॉल्वर बनायी थी। आजादी की लड़ाई में बड़े पैमाने पर यहां के हथियारों को प्रयोग किया गया था।

नोट : ये अभी अधूरी जानकारी है हमारे लेखक जल्द ही इस पोस्ट में और अधिक जानकारी जोड़ने का प्रयास करेंगे |